Friday, December 24, 2010

जब तू दुल्हन...................

रोज़ उनसे मुलाक़ात हो
दिल से दिल की कोई बात हो 


छत पे हों दोनों तन्हाई में
चांदनी से भरी रात हो


जीत सकता हूँ दुनिया को मैं
हाथों में गर तेरा हाथ हो


जब तू दुल्हन, मैं दूल्हा बनूँ
चाँद-तारों की बारात हो


हर सू मंज़िल नज़र आएगी
जो सफ़र में तेरा साथ हो


"लुत्फी" जी इक वफ़ा के लिए 
मर भी जाएँ तो क्या बात हो ........ 



3 comments:

आर्जव said...

siidde baat kahi jaay to utna prabhav paida nahi ho paataa hai. jo aap kahanaa chahate hai vah thik hai lekin lahazaa jyada straightforward ho gya hai.

Akhtar Khan Akela said...

shhzaad bhayi bhut bhut bhtrin alffazon ko jzbaat ki dor men piroyaa he isiliyen yeh behtrin rchna bni he mubark ho . akhtar khan akela kota rajsthan

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

लुत्‍फी भाई, बहुत खूब कहते हैं आप। बधाई।

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अंधविश्‍वासी तथा मूर्ख में फर्क।
मासिक धर्म : एक कुदरती प्रक्रिया।

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